जिब्रान नाम का एक संत था, जब उन्हें  कोई प्रश्न पुछा जाता तो जिब्रान अर्थहीन शब्दों (जिबरिश) में उसका जवाब देते थे I क्योंकि वे मानते थे , जो भाषा के पार है वह वे भाषा के माध्यम से नहीं बता सकते I भाषा का निर्माण  मानव ने अपने कल्पना शक्ति से किया है. विश्व को कोई भी सामूहिक भाषा नहीं है. पच्छिम के एक तत्ववेत्ता वित्त्गेंस्टेन कहते है की  भाषा सिर्फ वस्तुस्थिति  का चित्रण कराती है, महेत्व भाषा को नहीं बल्कि वस्तुस्थिति को जाता है I उर्दू का एक शेर याद आता है, "अल्फाज की पेचो में उलज़ते नहीं दाना, गव्वाज को मतलब है सदफ से की गुहर से?" यानि के बुद्धिमान लोग भाषा या अक्षरों में नहीं अटकते बल्कि उसमे जो अर्थ छिपा  हुआ है उससे मतलब रखते  है I आज इंग्लिश को विश्वभाषा के रूप में देखने का कारन ब्रिटिशों का राजकीय वर्चस्व है I अगर कल मराठी समाज पुरे विश्व पर राज करता तो आज की विश्वभाषा मराठी होती. सारांश यही है के भाषा मानवनिर्मित है, निसर्ग को कोई भाषा नहीं है, उसके पास भाषा का भेदभाव भी नहीं है I
 

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